अनुशासन पर निबंध |Discipline Essay in Hindi |Discipline Nibandh

Discipline Essay in Hindi |Discipline Nibandh

जीवन में व्यवस्था का अनुसरण करना ‘अनुशासन’ है, सम्बन्धित नियमों का पालन अनुशासन है, अपने को वश में रखना अनुशासन है। नियमानुसार जीवन के प्रत्येक कार्य करना जीवन को अनुशासन में रखना है। व्यवस्था ही सृजन का मुख्य आधार है। सूर्यचन्द्र, वायु, पृथ्वी, सभी अपने-अपने नियमानुसार चलते हैं। इनके परिभ्रमण में जरासा भी अनुशासन भंग हो जाएतो प्रलय मच जाएगी। चौराहे पर खड़ा ट्रैफिक पुलिस का सिपाही अनुशासन का प्रतीक है। उसकी आज्ञा के उल्लंघन का अर्थ होगा यातायात में आपाधापी, दुर्घटनाएँ और परिणामत:, यातायात में अवरोध। अनुशासन से दैनिक जीवन में व्यवस्था आती है। मानवीय गुणों का विकास होता है, नियमित कार्य करने की क्षमताप्रेरणा प्राप्त होती है और उल्लास प्रकट होता है। कर्तव्य और अधिकार का समुचित ज्ञान होता है। अनुशासन जीवन में रस उत्पन्न करके उसका विकास करता है।

उन्नति का द्वार है अनुशासन परिष्कार की अग्नि है अनुशासन जिससे प्रतिभा योग्यता बन जाती है। अनुशासन स्वभाव में शालीनता उत्पन्न करता है, शिष्टता, विनय और सज्जनता की वृद्धि करता है, शक्ति का दुरुपयोग नहीं होने देता। नियंत्रण पाकर शक्ति संगठित होती है। और अपना प्रभाव दिखाती है। इससे व्यक्तिगत जीवन उन्नत होता है। आदर्श जीवन की प्राप्ति के लिए दुष्प्रवृत्तियों के त्याग के प्रयास और सवृत्तियों के ग्रहण के अभ्यास का दूसरा नाम है अनुशासन। मनवचन और कर्म के संयम से जो व्यक्ति मन पर नियंत्रण कर सकता है, उसके वचन और कर्म स्वत: अनुशासित हो जाते हैं। उनमें पवित्रता आ जाती है। यही बात वाणी और कर्म की है। वाणी का अनुशासन मन और कर्म दोनों को निर्मल बनाने में सहायक होता है और कर्म की पवित्रता वाणी में ओज और मन में पुष्प की भावना उत्पन्न करती है।

कुछ लोग अनुशासन को स्वतन्त्रता में बाधक मानते हैं। ऐसा सोचना तथ्य को झुठलाना है। अनुशासन में भी नियन्त्रण रहता है और स्वतन्त्रता में भी नियन्त्रण दोनों में है। स्वतन्त्रता का अर्थ है-स्वयं अपना नियन्त्रण। अपने पर नियन्त्रण रखना भी एक प्रकार का अनुशासन है। स्वतन्त्रता जहां अपने अधिकार की रक्षा करती है, वहां दूसरों के अधिकारों को भी उतना ही अवसर प्रदान करती है। अतस्वतन्त्रता जहां अनुशासनहीन हो जाती है, नियम-पालन की सीमा तोड़ देती है, वहां स्वच्छन्दता आ जाती है। आप वर्षा से बचाव के लिए छाता लेकर पगडंडी पर चल रहे हैं। ठीक है, आप वर्षा से बचाव के लिए स्वतंत्र हैं, किन्तु यदि आप छाते से क्रीड़ा करें तो यह स्वच्छन्दता होगी। कारण, आपकी अनुशासनहीनता से छाता पगडंडी पर चलते किसी व्यक्ति की आंख में लग सकता है, या शरीर के किसी भाग को चोट पहुँचा सका है।

अनुशासन जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लाभप्रद है, चाहे वह छात्र जीवन हो, परिवार जीवन हो, समाज जीवन हो या राष्ट्र जीवन। अनुशासन जीवन के हर क्षेत्र का प्राण है। जीवन में अनुशासन पालन न केवल आवश्यक ही है, अपितु अनिवार्य भी है। अनुशासित रूप में चलने पर ही जीवन की सफलता आधारित है। जहाँ अनुशासन नहीं वहाँ सफलता नहीं, समृद्धि नहीं, विकास नहीं। तभी तो महाभारत युद्ध से पूर्व अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा था-‘शाधि मां त्वां प्रपन्तम्।’ (प्रभो ! मैं आपकी शरण में हैं, मुझे अनुशासित कीजिए।)

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