अनुशासन पर निबंध |Discipline Essay in Hindi |Discipline Nibandh

Discipline Essay in Hindi |Discipline Nibandh

अनुशासन का आजकल जिन अर्थों में इस्तेमाल किया जाता है, वह अंग्रेजी के डिसिप्लिन (Discipline) शब्द का हिन्दी पर्याय है। अनुशासन का यदि शब्द विग्रह करें तो यह शब्द दो शब्दों का ऐसा मिश्रित रूप है, जो अपने अर्थ को बदल देता है-अनु + शासनअर्थात् अनु का अर्थ है-पीछे, साथइधरउधरसदृश अथवा पास या समीप और शासन का अर्थ है-सरकार द्वारा की जाने वाली प्रचलित राज्यव्यवस्था, आज्ञाआदेश, शास्त्र, लिखित प्रतिज्ञा, दण्ड, इन्द्रियों का निग्रह।

अतः विद्यार्थियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे उन नियमोंव्यवस्थाओं अथवा कानूनों को मानेंउनका पालन करें जिन्हें कालेज स्कूल के प्राधिकारियों ने बनाया है अथवा सरकार द्वारा सम्यक प्रणाली से सनिश्चित किया गया है।

अनुशासन, आदर्श जीवन जीने का एक रास्ता है। इस रास्ते का निर्माण विद्यार्थी जीवन से होता है। इस कालावधि में यदि अच्छी आदतें पड़ गईंलक्ष्य बोध हो गया एवं विद्यार्थी ने अपने जीवन के महत्त्व को पहचान लिया, तो ऐसा छात्र निश्चित ही सफलता के लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ता चला जाता है क्योंकि उसको समय का सदुपयोग करना आ गया है। प्रायः देखा जाता है कि राजनैतिक पार्टियां विद्यार्थी संगठनों का इस्तेमाल अपने उद्देश्यों तथा अपनी विचारधारा के प्रचार के लिए करती हैं। इस प्रकार वे विद्यार्थियों को अपनी विचारधारा मानने के लिए प्रेरणा देती हैं और युवाशक्ति के बल पर जनाधार तैयार करना चाहती है ।

यह युवा शक्ति का दुरुपयोग है। हमारे उदीयमान छात्रों में से आगे चलकर कई वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर तथा उद्योगशील व्यक्ति बन सकते हैं जो देश के लिए उपयोगी सेवाएं कर सकते हैं। उनकी प्रतिज्ञा और शक्ति का मात्र राजनैतिक उपयोग करना, उनके भविष्य से खिलवाड़ करना है। अपनी राजनैतिक पहुंच के बल पर विद्यार्थी अनुशासन भंग करने की ओर उन्मुख होते हैं। वे अपने अध्यापकों की छोटी-छोटी बातों के लिए विद्यालयों में तोड़-फोड़ मचाते हैं, विद्यालय के वातावरण को दूषित करते हैं। इस प्रकार पढ़ाई अधूरी और अव्यवस्थित रह जाने की वजह से वे स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं।

अनुशासन रखना तथा अनुशासनिक वातावरण बनाए रखना विद्या का प्रथम कर्तव्य है। विद्यार्थी जीवन मनुष्य का सबसे कीमती जीवन है। इस जीवन का एकएक क्षण बहुत उपयोगी होता है। इस क्षण का सदुपयोग वही विद्या ठीक से कर पाता है। जो अनुशासन में रहता है। परिवार में मातापिता तथा अन्य गुरुजनों की आज्ञा मानना, अनुशासन का पहला सोपान है। कॉलेज स्कूल में गुरूजन अध्यापक गणों का कहना मानना, पढ़ाई की और पूरा ध्यान देना, घर के लिए जो काम दिया गया है उसे समय से पूरा करके ले जाना और विद्यालय में जो कुछ शिक्षा दी जाती है उसे ध्यान से सुनना तथा याद करना विद्यार्थी के लिए नितान्त आवश्यक है। यही विद्यालय का अनुशासन है। दिन भर स्कूल या कॉलेज की कैफेटीरिया में बैठना चाय कॉफी पीना, सिनेमा देखना और कक्षाएं छोड़कर मारे-मारे फिरना विद्यार्थी-जीवन का उपहास है। यह समय की बरबादी ही करना है।

आजकल बच्चों का एक बहुत बड़ा समूह यही सब करते देखा जाता हैपढ़ाई के प्रति उनकी यह अनिच्छा अंततः उन्हें न तो राजनीतिज्ञ बनने देती है और न ऐसा कोई कार्य करने की ओर प्रवृत्त होने देती है जिससे उनका और देश का हित हो सके। आज भारत में अर्द्धशिक्षित बेकार वही लोग हैं जिन्होंने विद्यार्थी जीवन के अनुशासन का उल्लंघन करके व्यर्थ के कामों में अपना समय खराब किया और समय निकल जाने के बाद कहीं के नहीं रहे।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता की जिस प्रवृत्ति ने जन्म लिया है, उसके एक नहीं अनेक कारण हैं। वर्तमान शिक्षा का स्वरूप इसका मुख्य कारण है। दूसरा कारण संघों तथा यूनियनों का बनना है जिसके कारण आए दिन वेतन बढ़ाने की तो मांग की ही जाती है किन्तु शिक्षा का स्तर सुधारनेविद्यार्थियों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए कोई उपाय नहीं किया जाता। छात्र यूनियनों में भी भटकाव आ गया है। वे राजनीति के मठाधीशों के इशारों पर काम करती हैं। उनके चुनाव इस प्रकार होते हैं जैसे संसद के चुनाव हो रहे हैं। इन खले चुनावों में वही सफल होते हैं।

जिनके पास पैसा है अथवा राजनीतिक समर्थन मिला हुआ है। परिणाम यह है कि वे विद्यार्थी जो कॉलेजों विद्यालयों में शैक्षिक सुधार तथा पढ़ाई की व्यवस्था के आकांक्षी हैं। तथा अनुशासनमय वातावरण रखना चाहते , वे चुनाव में भाग नहीं ले पाते क्योंकि उनके पास धन और राजनैतिक समर्थन का अभाव होता है।

विद्यार्थियों में अनुशासन की भावना सुदृढ़ बनाने के लिए नए सिरे से प्रयत्न करने की जरूरत हैशिक्षाप्रणाली में आधारभूत सुधार बिना अनुशासनहीनता की प्रवृत्ति का उन्मूलन किए संभव नहीं है।

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