होली पर निबंध |Holi Essay in Hindi |Holi Nibandh

Holi Essay in Hindi |Holi Nibandh

Essay on Holi in Hindi (500 Word)

होली भारतीय समाज का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। होली का शुभारंभ माघ शुक्ल पंचमी को ही हो जाता है जिसे बसंत पंचमी कहते हैं। किन्तु त्यौहार के रूप में यह फाल्गुन महिने के अंतिम दिन अर्थात पूर्णमासी के दिन होलिका दहन के रूप में मनाया जाता है और चैत्र कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि तक चलता है। कतिपय स्थानों पर होलिका दहन के दिन ही लोग एक-दूसरे पर रंग उड़ेलकर खुशियां मनाते हैं तो अधिकांश लोग चैत्र महिने के प्रथम दिन रंगों और अबीरों के प्रयोग से आनन्दोत्सव मनाते हैं।

होली हिन्दुस्तान के कणकण में आनन्दोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व भी है। इस पर्व के साथ भक्त प्रहलाद की कथा जुड़ी हुई है। हिरण्यकश्यप के के अत्याचार से तंग आकर भक्त प्रह्लाद भगवान विष्णु की आराधना में तल्लीन हो गया। उसके पिता ने उसे खत्म करने के अनेक उपाय किये किन्तु वह ईश्वरीय कृपा से बचता गया। अन्त में हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका को देवताओं से वरदान स्वरूप एक चादर मिला था जिसे ओढ़ लेने से अग्नि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। वह चादर ओढ़कर प्रह्लाद को गोद में ले अग्निकुंज में प्रविष्ट हो गई। किन्तु ईश्वर की कृपा से वही चादर प्रह्लाद का सुरक्षा कवच बन गया और होलिका उसी अग्नि में जल गई। इसी अलौकिक घटना के आनन्द में होलिका दहन के पश्चात् होली मनाने की प्रक्रिया चल पड़ी।

इस पर्व से जुड़ी एक और कथा है एक “लुढला” नाम की राक्षसी थी। वह बालकों को पकड़ कर खा जाया करती थी। मानव समाज उससे आतंकित रहने लगा। एक ऋषि ने उससे छुटकारा पाने के लिए यह विधान निकाला कि जो बालक अपने चेहरे को विकृत बना लेगा वह ‘लुढलाओं के कोप से बच जायेगा। कदाचित् इसी कारण नाना प्रकार के रंगों से अपने आपको विकृत और भयंकर बना लेने की प्रथा चल पड़ी और होली पर्व का प्रारंम हो गया।

होली मनाने का ढंग विचित्र है। फाग पूर्णिमा की रात्रि में संगीत-नृत्य की उमंगों से भरे हुए लोग होलिका का दहन करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दाह से उठने वाली लपटें पाप की कालिमा को नष्ट कर देती है।

होलिका दहन के पश्चात् चैत्र प्रतिपदा को प्रत्येक व्यक्ति रंगों से सराबोर रहते हैं। भारत वर्ष में ब्रज की होली’ अपना विशेष आकर्षण रखती हैं। यहाँ देश के कोने-कोने से लोग आते है। बड़ेछोटे, स्त्री-पुरुष आबालवृद्ध सभी इस आनन्दोत्सव के रंग में बहते दिखते है। भारतीय जन-जीवन के लिए यह पर्व उमंग और उल्लास का प्रतीक है। बंसत के मोहक और मादक परिवेश को होली का रंग और भी उत्तेजित कर देता है। अमीर-गरीब बड़े छोटे, ब्राह्मण-सभी साथ-मिलकर इस उत्सव का आनन्द उठाते हैं। यह त्यौहार सभी को अपने रंग में रंगकर पारस्परिक प्रेम के सूत्र में बांध देती है।

वर्तमान समय में इस पर्व की पवित्रता और प्रेम के मध्य अश्लीलता और फूहड़ता का भी समावेश हो गया है जो बांछनीय नही है। कभीकभी आपसी रागद्वेष और अनैतिक क्रियाकलाप के चलते प्रेम के इस त्यौहार में संघर्ष और वैमनस्यता की स्थिति भी दिखाई देने लगती है। इस प्रकार के कलंक से होली के पावन त्यौहार को अछूता रखना हमारा धर्म है। होली भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह हमें आपसी वैमनस्यता और रागद्वेष को छोड़कर परस्पर मेल मिलाप आपसी सौहार्द और प्रेम के साथ रहना सिखाती है। भारत की अनेकता और विषमता की खाईयों को पाटकर यह पर्व एकता और समता की जाज्वल्यमान धारा प्रवाहित करती है। यह पर्व हमारी अखण्डता का भव्य दिग्दर्शन कराती है ।

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