भारत में गरीबी पर निबंध |Poverty In India Essay in Hindi |Poverty In India Nibandh

Poverty In India Essay in Hindi |Poverty In India Nibandh

एक प्रगतिशील राष्ट्र के विकास का सबसे महत्वपूर्ण मापदण्ड गरीबी उन्मूलन की दिशा में सफलता मिलना है। भारत एक समृद्ध देश है, लेकिन यहाँ के निवासी गरीब हैं। इसकी गिनती विश्व के 10 गरीब देशों में सबसे ऊपर की जाती है। यद्यपि स्वतंत्रता के बाद सभी सरकारों का प्रमुख लक्ष्य भारत में नागरिकों को बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराना तथा गरीबो का समूल नाश करना रहा है। हमें इसमें काफी हद तक सफलता भी मिली है। विकास दरों में वृद्धि के साथ-साथ देश की जनसंख्या में गरीबी का प्रतिशत भी कम हुआ है। लेकिन इसके बावजूद आज भी गरीबी की स्थिति गंभीर बनी हुई है। भारत एक कृषिप्रधान देश है तथा गरीबी का स्वरूप मुख्य रूप से ग्रामीण है। हमारे देश के तीन-चौथाई गरीब ग्रामीण इलाकों में बसते हैं।

पिछले पच्चीस सालों से गाँवों और शहरों की दशा एवं दिशा लगभग एकसमान रही है। 1970 से 1990 के शुरुआती वर्षों में भी यह असमानता देखी जा सकती है। केरलआंध्रप्रदेश, गुजरात, पश्चिमी बंगाल में गरीबी में तेजी से कमी आईजबकि बिहार एवं उत्तर प्रदेश इस मामले में पिछड़े रहे हैं। गरीबी की दर में कमी आने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं (1) कृषि क्षेत्र का तेजी से विकास-कृषि क्षेत्र में तेजी से विकास होने के कारण खाद्यान्नों की कीमतों में कमी आई तथा कृषि श्रमिकों के वेतनमानों में वृद्धि हुई।

हमारे सकल घरेलू उत्पाद की दर भी 3.5 प्रतिशत की दर से बढ़ी तथा गरीबी में कमी आनी शुरू हो गई। (2) मुद्रास्फीति-खाद्यान्नों की कीमतों में वृद्धि का कारण मुद्रास्फीति की दरों का बढ़ना है। यदि मुद्रास्फीति की दरें बढ़ती हैं, तो खाद्यान्नों के दामों में भी वृद्धि होती है। कीमतों में वृद्धि के कारण गरीबी बढ़ती है। अत: गरीबी की दरों का एक मुख्य कारण मुद्रास्फीति की दरों में कमी आना भी है।

मानव संसाधन विकास की भूमिका मानव संसाधन विकास की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका प्रभाव गरीबी दर पर पड़ता है और इसका विकास काफी हद तक गरीबी की दर को कम करता है। इसका सफल उदाहरण हमें केरल के संबंध में दिखाई देता है। केरल में सकल घरेलू विकास की दर ऊँची नहीं थी। यहाँ अर्धकुशल श्रमिकों का बड़े पैमाने पर प्रवास हुआ तथा इन श्रमिकों को होने वाली आय की वजह से गरीबी दरों में भी कमी आई1990 के दशक के मध्य से गरीबी दर में बहुत धीमी गति से कमी हुई है। वर्ष 1993-94 में यह दर 35 प्रतिशत थी तथा 1997 में यह घटकर 34 प्रतिशत हुई।

कृषि क्षेत्र की विकास दर ऊंची रही तथा सामाजिक सूचकांकों में भी सुधार हुआ। इसके बावजूद गरीबी अपेक्षाकृत धीमी गति से कम हुई। बदलाव के अन्य कारणों को समझने के लिए हमें मुद्रास्फीति, कृषि विकास एवं विकास की राज्यवार असमानताओं को हाल की आर्थिक | गतिविधियों के संदर्भ में समझना होगा। जैसा कि हम जानते हैं कि मुद्रास्फीति की दर यदि बढ़ती है तो इसके साथ गरीबी भी बढ़ती है। 80 के दशक में मुद्रास्फीति की दर 90 के दशक से कम थी। इस वजह से 90 के दशक में खाद्यान्नों की कीमतें ऊंची रही, जिसके कारण गरीबी दरों में गिरावट कम हुईइस प्रकार हम देखते हैं कि गरीबी निवारण के क्षेत्र में मिली सफलता केवल आंशिक है। देश की गरीबी को कम करने के लिए कुछ कठोर निर्णय लेने की आवश्यकता है।

गरीबी दर को कम करने तथा इस समस्या से निपटने के लिए हमें अपनी साक्षरता दर को ऊपर उठाने की आवश्यकता है, जिसके लिए हमें अधिक से अधिक बच्चों को साक्षर बनाना हागा। देश की आर्थिक, कानूनी एवं राजनीतिक व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ानी होगी। विकास के लिए आवश्यक आधारभूत ढाँचे को सुदृढ़ करना होगा। इसके अतिरिक्त, सामाजिक क्षेत्र में अधिक सक्रियता की जरूरत है। उत्पादन एवं सेवा क्षेत्रों को क्रमश: निजी क्षेत्र को सौंप देना चाहिए तथा शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर सरकार को अपना पूरा ध्यान देना चाहिए। इनके विकास की समुचित सुविधा करनी चाहिए तथा इस क्षेत्र का सर्वागीण विकास करना चाहिए। प्राथमिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाना चाहिए।

मानव संसाधन के विकास को बढ़ावा देना चाहिएइसके समुचित विकास के बिना गरीबी हटाई नहीं जा सकती। सरकार को विभिन्न क्षेत्रों में दी जा रही सब्सिडी में कटौती करनी होगी, ताकि शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन, आधारभूत ढाँचा आदि क्षेत्रों के लिए अधिक पूंजी उपलब्ध कराई जा सके। इसके साथ ही ऊर्जा एवं सिंचाई क्षेत्रों का निजीकरण आवश्यक अभिशासन के विभिन्न स्तरों एवं पहलुओं में सुधार लाने की आवश्यकता है। विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया से ही अभिशासन में वांछनीय सुधार लाया जा सकता है।

इसके साथ उत्पाद श्रम एवं बाजार का नियंत्रण भी समाप्त करना होगा। तभी विकास में सुधार होगा तथा गरीबी की दरों में गिरावट आएगी। ऊँची विकास दर तथा निम्न गरीबी दर प्राप्त करने के लिए आधारभूत ढाँचे का मजबूत होना जरूरी है। इस क्षेत्र में निजी एवं सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों की भागीदारी आवश्यक है। यदि हम इन सब पर विचार करके इन्हें व्यावहारिक रूप में कार्यान्वित करें तो नि:संदेह ही गरीबी का उन्मूलन हो सकेगा

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