भारत में गरीबी पर निबंध |Poverty In India Essay in Hindi |Poverty In India Nibandh

Poverty In India Essay in Hindi |Poverty In India Nibandh

प्रस्तावना: वर्ष 1996-97 में राष्ट्रीय स्तर पर व्याप्त कई भ्रम टूटे हैं। विगत चुनावों के परिणामों ने देश के सभी राजनीतिक दलों की कलई खोल दी है। अचानक यह रहस्य भी बेपर्दा हो गया कि गरीबी घटी नहीं, बल्कि बढ़ी है। आने वाले समय में यह देश की सबसे गम्भीर समस्या होगी। चिन्तनात्मक विकासः वर्तमान समय में चहुं ओर से गरीबी मिटाने की बात सुनाई देती , पर क्या मौजूदा आर्थिक व्यवस्था के दायरे में गरीबी मिटाना सम्भव है? अगर सम्भव है। तो उसके लिए नीति सम्बंधी दिशा क्या हो सकती है?

पहली बात यह कि गरीबी के उन्मूलन और जनता की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए तीन चीजें जरूरी हैं। पहली यह कि विकास की दर पर्याप्त रूप से ऊँची हो, जिससे उपभोग के लिए कुल उपलब्ध साधनों में उपयुक्त ढंग से बढ़ोतरी होती रहे।

दूसरे यह विकास ऐसे ढंग से होना चाहिएजिससे खुद विकास की प्रक्रिया उपभोग के इन साधनों का काफी हद तक समानतापूर्ण वितरण सुनिश्चित कर सके। तीसरेइस तरह का विकास हासिल करने के दौरान भी, गरीबी उन्मूलन के कुछ फौरन तथा अन्तरिम कदम उठाये जाने चाहिएताकि गरीबों को इस विकास के फल अपने पास तक पहुँचने का इन्तजार न करना पड़े। उपसंहारः आज गरीबी की समस्या जटिलतम होने की पूरी सम्भावना है। अगर इस समस्या पर समय रहते पुनर्विचार नहीं किया गया और इसे राजनीतिक आर्थिक चर्चा के केन्द्र में फिर से नहीं लाया गयातो पूरा देश भयावहअसन्तुलित और अन्यायकारी ‘कथित समृद्धि’ के रास्ते पर बढ़ लेगाजिसका अंतिम परिणाम किसी भी तरह लाभकारी नहीं होगा।

गरीबी का उन्मूलन कमी एक महान लक्ष्यएक पवित्र धर्म समझा जाता था, लेकिन पिछले कुछ समय से गरीब और उसकी गरीबी, दोनों राजनीतिक खेलों के मोहरे बन गए हैं। जैसे जिसकी गोटी ठीक बैठ जाएउसी ढंग से राजनीतिक दल और एक के बाद एक बनी सरकारें भी गरीबों को दांव पर लगाती रही हैं और अब भी लगा रही हैं। इससे राजनेताओं की अपनी खिचड़ी तो पक जाती है, लेकिन गरीब भूखा ही रहता है। फुटबॉल की तरह ठोकरें तो गरीब खाता रहा है, लेकिन जीत का श्रेय अथवा हार का दोषदूसरों को मिलता रहा है।

अधिक पीछे न जाएं और पिछले ढाई दशकों में गरीबी उन्मूलन के प्रयासों को ही देखें तो परिणाम यही दिखाई देता है कि देश में गरीबी का पुनः अवतरण हो गया है और हम राजनीतिक रूप से फिर गरीबी हटाओ’ युग में पहुंच गए हैं। अगर यह रहस्योद्घाटन हो जाए कि जिन करोड़ों व्यक्तियों की आंखों के आंसू पोंछने के लिए बापू ने अहिंसक आन्दोलन चलाया था, उनकी संख्या और उनकी आंखों में आंसुओं की मात्रा घट नहीं बल्कि तेजी से बढ़ रही है, तो देश में प्रतिवर्ष मनाये जाने वाला उत्सव एवं समारोह निरर्थक और बेमानी से लगने लगते हैं।

देश के आर्थिक विकास के लिए हमने पंचवर्षीय योजनाओं के सहारे सुनियोजित कार्यक्रम चलाए और अब हम नौवीं पंचवर्षीय योजना की तैयारी में लगे हैं, लेकिन इसी दौरान यह पता लगने पर कि समाज के जिन वर्गों का उत्थान इन योजनाओं का लक्ष्य रहा है, उनकी सही स्थिति और संख्या का भी पता नहीं है, योजनाकारों के सारे कार्यक्रम अस्तव्यस्त हो गए हैं। देश में गरीबों की असली संख्या कितनी है, वे किस नारकीय दशा में रहते हैं, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोटीकपड़े की समस्याओं का क्या हल है, इसका सही आकलन जब तक नहीं होगा, तब तक उन समस्याओं का निदान कैसे हो सकेगा।

यह दुविधा योजनाकारों के सामने आज भी है लेकिन इसका कोई ठोस उपाय खोजने के बजाएअब भी राजनीतिक नजरिए से, वोटों के हानि-लाभ की नजर से इस समस्या को हल करने की चेष्टा की जा रही है। लोकसभा के पिछले आम चुनावों से कुछ पहलेसरकार ने दावा किया था कि देश का आर्थिक विकास तेजी से हो रहा है, लोगों को भरपेट खाना मिलता है, अनाज का निर्यात होने लगा है। और कंगाली गरीबी की रेखा से नीचे) की हालत में रहने वालों की संख्या अब केवल 18 प्रतिशत रह गई है।

दस वर्ष पहले यह संख्या ग्यारह प्रतिशत अधिक थी। तब देश को आशा बंधी थी। कि गरीबी अगर इसी तेजी से मिटती रही तो जल्दी ही देश में कोई गरीब नहीं रहेगा। लेकिन जब नौवीं योजना की तैयारी चलने लगी और ठोस धरातल पर पैर रखने का समय आया तो पता चला कि गरीब कम नहीं हो रहे, आंकड़ों और फार्मूलों के आवरण से उन्हें लुप्त करने का प्रयास किया जा रहा है।

यह आवरण जब उठाया गया तो स्पष्ट हुआ कि अवास्तविक पैमाने बनाकर केवल चुनावी हित के लिए गरीबी की भयावहता को ढकने का प्रयास किया जा रहा था। लेकिन कोई भी आंकड़ा दिया जाएउससे वास्तविकता को छुपाया नहीं जा सकता। गरीब तो गरीब ही रहेगा, भले ही सरकारी फाइलों में उसे कितना ही सम्पन्न बना दिया जाए। गरीबी मिटाने का दावा करके, गरीबों की संख्या कम करके दिखाने से राजनीतिक लाभ क्या मिला यह अलग विश्लेषण का विषय है किंतु इतना निश्चित है कि इससे गरीब लाभान्वित नहीं हुआ, वंचित अवश्य हुआ है और हमारी पूरी विकास प्रक्रिया को आघात लगा है। राजनीतिज्ञों को अब यह सोचना ही होगा कि अपने तात्कालिक लाभ के लिए वह देशवासियों के दीर्घकालिक हितों की कितनी बलि दे सकते हैं।

देश के गरीब के सिर पर सबसे भारी बोझ उस कर्ज का है जो उसने अपनी तात्कालिक जरूरतें पूरी करने के लिए गांव के साहूकार से लिया है। जिसके पास आज खाने भर के लिए अनाज नहीं है, वह कल इस स्थिति में कैसे आ जाएगा कि अपना पेट भी मरे और कर्ज भी वापस करे। उसकी इसी असमर्थता को देखकर सरकारी बैंक भी उसे सस्ती दर पर कर्ज देने को तैयार नहीं हैं। सरकारी खानापूर्ति के लिए जिन्हें बैंक से कर्ज मिल भी जाता है उनसे उसकी वसूली के लिए जो तरीके अपनाए जाते हैं, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। ऐसे कारनामे रोज पढ़ने सुनने में मिल जाते हैं। लेकिन देश के गरीब पर इससे भी बड़ा एक अप्रत्यक्ष बोझ है।

गरीब को उस कर्ज का रंच मात्र भी लाभ तो नहीं पहुंचा जो सरकार ने घरेलू और विदेशी संसाधनों से लिया है। लेकिन कर्ज की वापसी के लिए वह भी बराबर का जिम्मेदार माना जाएगा। भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कर्ज लेने वाला देश बन गया है। भारत पर इस समय लगभग साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये का केवल विदेशी कर्ज चढ़ा हुआ है अर्थात् हर भारतीय नागरिक पर इस समय लगभग साढ़े तीन हजार रुपए का ऐसा कर्ज है जिसका उसने उपभोग नहीं किया है। जिस गरीब की आय 240 रुपए मासिक भी नहीं है, उसके लिए यह कर्ज उतारना शायद कई पीढ़ियों का काम हो जाएगा।

इस हालत से निपटने के लिए हमें अपनी नीतियों में बदलाव लाने होंगे। अगर संगठित औद्योगिक क्षेत्र में एक करोड़ रुपए लगाए जाएं तो उससे मुश्किल से चालीस लोगों को रोजगार मिलेगा लेकिन वही घन अगर ग्रामीण उद्योगों में लगाया जाए तो दो सौ से अधिक पांच गुना अधिक) लोग रोजगार पा सकते हैं। यह याद रखना होगा कि अब भी चालीस प्रतिशत से अधिक निर्यात आय इन्हीं छोटे उद्योगों से होती है। आजकल बाजार की अर्थव्यवस्था का बोलबाला है।

इसी का दूसरा नाम विश्व स्पर्धा है इसमें हर वस्तु के मूल्य मांग और आपूर्ति के अनुरूप तय किए जाते हैं लेकिन जो व्यक्ति इतना दरिद्र है कि अपना पेट नहीं भर सकताउसे इस विश्व स्पर्धा बाजार के हवाले कर देना क्या किसी भी सभ्य समाज के लिए शोभा की बात होगी? गरीबों के उत्थान के लिए अब तक जो भी घोषणाएं की जाती रही हैं, सरकार ने जो भी वचन अब तक दिए हैं, उनके अनुरूप काम नहीं हुआ है। योजनाएं और कार्यक्रम या तो रास्ते में धराशायी हो गए या उन्हें मात्र औपचारिकता वश चलाया गया। गरीबी उन्मूलन की विफल योजनाओं पर पर्दा डालने के लिए उन्हें नएनए नामों से प्रचारित किया जाता रहा , लेकिन सरकार की कथनी और करनी में जो अंतर रहा है, उससे गरीबों के मन में हताशा और कुंठा उत्पन्न हुई है।

अधिकांश पश्चिम देशों में सरकारी आश्वासनों और मौखिक सहानुभूति से त्रस्त गरीब अपराधों की शरण में चले जाते हैं। भारत में भी सामाजिक अपराधों में वृद्धि का मूल इसी गरीबी में ढूंढा जा रहा है। अभी यहां जनता के धैर्य का बांध छलक अवश्य रहा है, टूटा नहीं है। इसलिए अब भी समय है कि हम अपनी नीतियों में ऐसे मोड़ ले आएं जिनसे समाज के निम्नतम स्तर के व्यक्ति का जीवनस्तर भी ऊपर उठ सके ।

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