सर्दी के मौसम पर निबंध |Winter Season Essay in Hindi |Winter Season Nibandh

Winter Season Essay in Hindi |Winter Season Nibandh

हमारा देश प्रकृति के रंग बिरंगे दृश्यों को विभिन्न ऋतुओं के माध्यम से उपस्थित करता है, ये ऋतुएं है- बसंतग्रीष्म, पावस, शरद, हेमंत और शिशिर। किन्तु हम ऋतुओं को स्पष्टतः तीन रूप में अनुभव करते हैं- गर्मी, बरसात और जाड़ा । इनमें जाड़े की रात किसी के लिये स्वर्गिक सुख लेकर आती है। तो किसी के लिए प्राणघातक सिध्द होती है जाड़े में सर्दी के कंपन से बचने के लिए लोग शाम होते ही अपने-अपने घरों में कैद हो जाते हैं। चारों ओर सुनसान वातावरण में कहीं कोई दिखाई नही देता। ठंड से कांपते हुए जानवर की आवाज भी टिदुर जाती है। शाम होते ही बाजार श्मशान की तरह वीरान और सुनसान नजर आने लगता है। सर्दी की रातों में इतना अधिक कुहासा गिरता है कि यातायात की व्यवस्था भी ठप हो जाती है।

जाड़े की रात में ठंड का प्रकोप कई लोगों को अपना ग्रास बना लेता है। यह रात लुभावनी नहीं होती बल्कि शैतान की आकृति की तरह डरावनी भयावह और पीड़ादायक होती है। सुरसा की जमुहाई सी और कुम्भकर्ण के नींद की तरह गहरी जाड़े की रात काटे नही कटती। आसमान पर तारे भी टिठुरते हुए दिखाई देते हैं। रात जैसेजैसे गरमाती है वातावरण आतंकमय होता जाता है। बरफीले पछुआ पवन के आतंक का साम्राज्य सभी को निगल जाना चाहता है। किन्तु धनकुबेरोंसेठ-साहुकारों या वैभव संपन्न लोगों के लिए तो जाड़े की रात एक अनोखे सुख और आनंद की रात होती है। पद्माकर के शब्दों में गुलगुली गिलमेंगलीचा है, गुनीजन हैं, चांदनी है, चिक है, चिरागन की माला है। कहै पद्माकर त्यों गजक गिजा है, सजी सेज है, सुराही है, सुरा है और प्याला है ।

शिशिर के पाला को न व्यापत कसाला तिन्हैं। जिनके अधीन एते उदित मसाला है। तान तुक ताला है, विनोद के रसाला है, सुबाला है, दुशाला है, विशाल चित्रशाला है। जी हां, यह जाड़े की रात पैसे वालों का कुछ भी बिगाड़ नहीं पाती। मोटे-मोटे लिहाफों और गद्दों में लिपटे लोग सर्दी के सर्पदंश से बचे रहते हैं। इनके लिए यह रात कुदरत की भेंट और ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है। अमीरी के सुरक्षा कवच से टकराकर शैत्य के तीखे वाण विलीन हो जाते हैं। किन्तु जिनके पास न खाने के लिए अन्न है, न तन ढंकने के लिए वस्त्र।

जो चीथड़ों में लिपटे खुले आसमान के नीचे किसी फुटपाथ पर या तंग गलियों में किसी तरह अपना गुजारा करते हैं, ऐसे अभागों के लिए यह रात प्रकृति का सबसे बड़ा अभिशाप बनकर आती है। यह रात अभावग्रस्तता की पंगु जिदंगी का भार ढोते हुए दीन-हीन लोगों के अस्तित्व को निगल जाने के लिए प्रस्तुत रहती है।

बेचारे गरीब के पोर-पोर में घुसती हुई ठंड की लहरें उन्हें अभाव की सूईयों की तीखी चुभन का एहसास दिलाती है और वे इस काल-रात्रि के टलने की प्रतीक्षा करते रहते हैं। भगवान से प्रार्थना करते हैं कि कब सरसों के फूलों पर मीठी-मीठी धूप खिलेगी और वे प्रकृति के खुले आगंन में उस धूप को तापकर चहकेंगेगाएगें और भीड़भरे फुटपाथों के किसी ओर बैठकर अपने अभाव ग्रस्त भाईयों के साथ गुलछर्रे छोड़ते हुए सर्द रातों में फैले हुए दुःख दर्द भूल जाएंगे।

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