महात्मा गांधी पर निबंध |Mahatma Gandhi Essay in Hindi |Mahatma Gandhi Nibandh

Mahatma Gandhi Essay in Hindi |Mahatma Gandhi Nibandh

राष्ट्रपिता मोहन दास कर्मचंद गांधी महात्मा गांधी) का जन्म 2 अक्टूबर, 1869 को गुजरात के काठियावाड़ प्रांत में पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ था। महात्मा गांधी के इस जन्म दिवस को समूचा राष्ट्र एक राष्ट्रीय पर्व के तौर पर मनाता है। इस दिन सरकारी कार्यालयों, संस्थानों व स्कूलों में अवकाश रहता है। 2 अक्टूबर के दिन राजधानी दिल्ली में स्थित राजघाट, जहां पर गांधीजी की समाधि है, पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व अन्य गण्यमान व्यक्ति जाते हैं और वे वहां पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इसी तरह अन्य सरकारी व गैरसरकारी संस्थानों, स्कूलों व शैक्षिक संस्थानों में गांधीजी की राष्ट्र के प्रति की गयी सेवाओं का स्मरण किया जाता है और उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। भारत के राष्ट्रपिता, नव राष्ट्र के निर्माता एवं भाग्य विधाता महात्मा गांधी एक ऐसे अनूठे व्यक्ति थे जिनके बारे में नाटककार बर्नार्ड शॉ ने उचित ही कहा था कि आने वाली पीढियां बड़ी मुश्किल से विश्वास कर पाएंगी कि कभी संसार में ऐसा व्यक्ति भी हुआ। होगा।” वे सत्यअहिंसा और मानवता के पुजारी थे। वे उन महान् पुरुषों में से थे जो इतिहास का निर्माण किया करते हैं।

महात्मा गांधी के पिता राजकोट रियासत के दीवान थे। उनकी माता पुतलीबाई धार्मिक विचारों वाली सरल-सीधी महिला थीं। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा पोरबन्दर तथा राजकोट में हुई । वे 18 वर्ष की अवस्था में यहां से मैट्रिक की परीक्षा पास करके बैरिस्टरी पढ़ने के लिए इंग्लैंड गए। उनका विवाह तेरह वर्ष की अवस्था में ही कस्तूरबा से हो गया था। जब वे बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे तो उनकी माता का साया उनके सिर से उठ चुका था। संयोगवश वकालत करते समय एक गुजराती व्यापारी का मुकदमा निपटाने के लिए गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा। वहां जाकर उन्होंने गोरों द्वारा भारतीयों के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार को देखा। वहां पर गोरों ने उनके साथ भी दुर्यवहार किया। उन्होंने निडरता के साथ गोरों के इन अत्याचारों का विरोध कियाजिसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा। अन्त में उन्हें इसमें सफलता ही मिली।

1915 ई. में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने पर उन्होंने स्वतंत्रता के लिए अनेक कार्यक्रमों में भाग लिया। उन्होंने अंग्रेजों के रोलट एक्ट का विरोध किया। सम्पूर्ण राष्ट्र ने उनका साथ दिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए उन्होंने सत्य और अहिंसा का मार्ग अपनाया। वे अनेक बार जेल भी गए। उन्होंने सत्याग्रह भी किए। बिहार का नील सत्याग्रह डाण्डी यात्रा या नमक सत्याग्रह व खेड़ा का किसान सत्याग्रह गांधीजी के जीवन के प्रमुख सत्याग्रह हैं। गांधीजी ने भारतीयों पर स्वदेशी अपनाने के लिए जोर डाला। उन्होंने सन् 1942 में भारत छोड़ो’ आंदोलन चलाया। गांधीजी के अथक प्रयत्नों से 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। गांधीजी भारत को एक आदर्श रामराज्य के रूप में देखना चाहते थे। गांधीजी छूतछात में विश्वास नहीं रखते थे। उनका सारा जीवन अछूतोद्धार ग्राम सुधार, नारी शिक्षा और हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए संघर्ष करने में बीता। 30 जनवरी सन् 1948 को दिल्ली की एक प्रार्थना सभा में जाते समय एक हत्यारे नाथूराम गोडसे ने गांधीजी पर गोलियां चला दीं। उन्होंने वहीं पर ‘हे राम’ कहते हुए अपने प्राण त्याग दिए। गांधीजी मर कर भी अमर हैं।

‘आने वाली पीढ़ियाँ शायद मुश्किल से ही यह विश्वास कर सकेंगी कि गांधीजी जैसा हाड़-माँस का पुतला कभी इस धरती पर हुआ होगा। ” अलबर्ट आइन्स्टीन का उपयुक्त कथन आज के इन आतंकवादी, बर्बर और जघन्य अमानवीय कृत्यों को देखकर सचमुच बहुत कुछ सोचने पर विवश कर देता है। गांधी मात्र हाड़ माँस के व्यक्ति ही नहीं थे, बल्कि वे एक सम्पूर्ण विचारात्मक आंदोलन थे, सामयिक दर्शन थे और पूरन्देशी युग पुरुष थे। महात्मा बुद्ध के बाद शांति के वे ऐसे मसीहा थे, जिन्होंने सत्य, अहिंसा के व्यापक महत्व को समझा और अपने में आत्मसात कर क्रियान्वित भी किया। जैसा वे कहते करके भी दिखाते थे। वे समग्र मानवता के कल्याण और सर्वोदय के लिए जीवन भर प्राणपण से जुटे रहे।

काठियावाड़ की रियासत पोरबंदर के दीवान करमचंद गांधी को 2 अक्टूबर, 1869 के दिन पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। पारिवारिक प्यार से मोनिया के नाम से पुकारे जाने वाले मोहनदास आने वाले कल के विश्वविख्यात सत्य-अहिंसा-शान्ति के अग्रदूत होंगे। उस समय यह कौन जानता था। ? बचपन में ही भगवद्गीता व धार्मिक वातावरण के साथ ‘श्रवण कुमार की पितृभक्ति’ और सत्यवादी हरिश्चन्द्र नामक पुस्तकों का उनके शिशु मन पर गहरा प्रभाव पड़ा था। हालांकि बाल्यावस्था की नासमझी में चोरी, झूठधूम्रपान धोखा, अविश्वास जैसे निंदनीय कार्य करने वाले बालक गांधी एक बदनाम मित्र के बहकावे में आकर कोटे की सीढ़ियाँ तक चढ़ गए थे। इन घटनाओं को देखकर स्पष्ट होता है कि एक सामान्य व्यक्ति को असामान्य बनने में कैसे कठिन संघर्ष से गुजरना पड़ा होगा। गांधी की आंतरिक इच्छा डॉक्टर बनने की थी, किन्तु पैतृक पेशा दीवानगीरी के लिए उन्हें बैरिस्टर बनने के लिए प्रेरित किया गया। इंग्लैण्ड प्रवास में वे शिक्षा ग्रहण करते हुए माँस-मदिरा तथा सुंदरियों के मोहपाश से विलग रहे। बैरिस्टर बनने के बाद गांधी में काफी परिवर्तन हुआ था।

इंग्लैण्ड से वापस लौटते समय तक गांधीजी भाषण देना नहीं जानते थे, पर विदाई बेला में कुछ बोलना था ही। गांधी के दिमाग में एडीसन की घटना आई। एडीसन को ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में बोलना था। वे खड़े होकर ‘आई कंसीव, आई कंसीव, आई कंसीव’ तीन बार बोले और बैठ गए। अंग्रेजी में कंसीव का अर्थ ‘मेरी धारणा है’ के अतिरिक्त गर्भ ठहरना भी होता है। बस फिर तो एक सिरफरे ने एडीसन की इस दशा पर छींटाकशी कर ही दी-‘इन सज्जन ने तीन बार गर्भ तो धारण किया, मगर जना कुछ भी नहीं’ हाउस में जोरदार ठहाके लगे। गांधी ने इसी घटना का उल्लेख कर भाषण शुरू करके अपनी कमजोरी छिपाने का मन तो बना लिया पर खड़े होकर बोलने का साहस न जुटा सके। ‘धन्यवाद’ कहकर बैठ गएलेकिन आगे चलकर वही गांधी मानव उत्थान के लिए शांति का संदेश देने में कितने निपुण सिद्ध हुए। इतिहास साक्षी है कि शांति और अहिंसात्मक तरीकों को अपना हक और न्याय प्राप्त करने का सबल अस्त्र मानने वाले गांधी ने इन अमोघ अस्त्रों से उस ब्रिटिश साम्राज्यवादी शक्ति को पस्त कर दियाजिसके साम्राज्य में सूर्य नहीं डूबता था। आज भी विश्व में अन्याय और शोषण के विरूद्ध गांधीवादी दृष्टिकोण अपनाया जाता है। राजनीतिक आंदोलन चलाने वाली सत्ताहीन या सत्ताधारी शक्तियाँ अथवा नैतिक संघर्ष पर आमादा पार्टियाँ सभी अहिंसा की पक्षधर हैं। गांधीवाद की यही प्रासंगिकता है।

महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर यदि हम एक विहंगम दृष्टि डाले तो स्पष्ट होगा कि एक साधारण से व्यक्ति के रूप में पहुँचे गांधी ने 22 वर्ष की लम्बी लड़ाई में अपमान, भूखमानसिक संताप व शारीरिक यातनाएँ झेलते हुए न केवल राजनीतिक, बल्कि नैतिक क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ प्राप्त कीं, उसकी मिसाल अन्यत्र मिलना असम्भव है। इसी 22 वर्ष के गहन अनुभवों से भारत की बागडोर अपने हाथ में लेना गांधी की विवशता थी।

गांधीजी की भक्त अंग्रेज महिला मेडेलिन स्लेड जो मीरा बहन के नाम से विख्यात हुईलिखती हैं, ‘मैंने जैसे ही साबरमती आश्रम में प्रवेश किया तो एक गेहूँवण प्रकाश पुंज मेरे समक्ष उभरा और मेरे मनमस्तिष्क पर छा गया।” गांधी के प्रति लोगों में ऐसी ही पावन आस्था थी। डांडी यात्रा में 24 दिनों तक लगातार पैदल चलकर समुद्र के पानी को सुखाकर बनाया हुआ थोड़ा सा नमक उठा लेने की बात, वायसराय को नाटकीय और मूर्खतापूर्ण लगी होगी। पर धोती धारी इस क्षीणकाय महामानव के इस नाटकीय कार्य से पूरे देश में खलबली मच गई। नमक कानून के उल्लंघन की यह प्रतीकात्मक घटना जनस्फूर्ति के लिए रामबाण सिद्ध हुई। 29 जनवरी को गांधी ने अपनी भतीजी पौत्री मनु से कहा था, ‘‘यदि किसी ने मुझ पर गोली चला दी और मैंने उसे अपनी छाती पर खेलते हुए होठों से राम का नाम ले लिया तो मुझे सवा महात्मा कहना।’” और यह कैसा संयोग था कि 30 जनवरी को उस महात्मा को मनोवांछित मृत्यु प्राप्त हो गई। संवेदित स्वरों में लार्ड माउंटबेटन ने ठीक ही कहा था, “सारा संसार उनके जीवित रहने से सम्पन्न था और उनके निधन से वह दरिद्र हो गया है।”

रूसी ऋषि टालस्टाय की अनुमति और आशीर्वाद से दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग से 22 मील 1100 एकड़ धरती पर ‘टालस्टाय फार्म’ की स्थापना हुईजिसके सूत्रधार थे-जर्मनी के वास्तुशिल्पी काले नवाब साहब। वे टालस्टाय के भक्त और गांधी के अभिन्न मित्र थे, वहीं सहशिक्षा के दौरान एक छात्र-छात्रा के संसर्ग के मामले से तूफान उठ खड़ा हुआ तो गांधी ने प्रायश्चित बतौर स्वयं सात दिन का उपवास रखकर एक नई दिशा प्रदान की। गांधी के कुल अठारह उपवासों में यह प्रथम उपवास था और इसका अच्छा परिणाम निकला।

गांधीजी की आजीवन यही मान्यता रही कि अपनी तपस्या के बल से ही दूसरों का हदय परिवर्तन किया जा सकता है। गांधी के इस अफ्रीकी सत्याग्रह में कालेनबाक, श्रीमती पोलक एवं कु. श्लेसिन तीन विदेशी मित्रों का भरपूर सहयोग रहा। गांधी की स्पष्ट नीति थी कि वे कभी दूसरे को पराजित करके स्वयं विजयी नहीं बनते थे, बल्कि उसे प्रभावित करके अपना बना लेते थे।

उनके भारत लौटने पर गुरूदेव टैगोर ने कहा था, ‘भिखारी के लिबास में एक महान आत्मा लौटकर आई है।” सोने की खानों के देश से गांधी अनुभव की ऐसी पूंजी लेकर ही महान हुए थे।

सन् 1919 से लेकर 1948 में अपनी मृत्यु तक भारत के स्वाधीनता आंदोलन के महान ऐतिहासिक नाटक में गांधी की भूमिका मुख्य अभिनेता की रही। उनका जीवन उनके शब्दों से भी बड़ा था, चूंकि उनका आचरण विचारों से महान था और उनकी जीवन प्रक्रिया तर्क से अधिक सृजनात्मक थी। अंग्रेजों के विश्वासघात ने गांधी को 1921 में असहयोग आंदोलन छेड़ने को विवश कर दिया। इस आंदोलन से देश की समस्त जनता में अपूर्व जागृति उत्पन्न हुई। चौरी-चौरा आदि स्थानों पर हिंसात्मक घटनाओं को देखकर गांधी ने आंदोलन स्थगित कर दिया। सन 1930 में गांधी ने पुन: सविनय अवज्ञा आन्दोलन का व्यापक प्रदर्शन कर दिखाया।

अंग्रेजी हुकूमत ने सख्ती से दमन चक्र किया। स्वतंत्रता की अग्नि और भड़क उठी। 26 जनवरी, 1930 को हिन्दुस्तान के करोड़ों लोगों ने पूर्ण स्वराज की शपथ ली थी। अत26 जनवरी को ही स्वाधीन भारत का संविधान लागू कर इस दिन को गणतंत्र दिवस की गरिमा प्रदान की गई है।

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