पर्यावरण पर निबंध |Environment Essay in Hindi |Environment Nibandh

Environment Essay in Hindi |Environment Nibandh

प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक मनुष्य ने अतीव उन्नति की है। प्रागैतिहासिक काल से लेकर आधुनिक वैज्ञानिक सुपरसोनिक युग तक मनुष्य ने सफलता एवं विकास के अनेक पायदान चढ़े हैं। यहां तक कि आज का मनुष्य इस वसुंधरा का त्यागकर चांद और मंगल ग्रह पर जीवन की सम्भावनाएं तलाशकर वहां स्थायी रूप से बस जाने का विचार भी कर रहा है। उसके इस विचार के पीछे प्रमुख कारण है-पृथ्वी पर बढ़ते प्रदूषण की समस्या। वस्तुतः यह समस्या भी स्वयं मनुष्य को ही देन है।

वह अपना विकास करने के स्वार्थ में इतना अंधा हो गया कि उसने प्राकृतिक संसाधनों का यथाशक्ति दोहन कियाजैसे-पेड़पौधों और प्राकृतिक वनस्पति से भरपूर वनों को काटकर वहां कंक्रीट की इमारतें और कलकारखाने बनाए, चट्टानों को खोदकर कोयला और अन्य खनिज पदार्थ निकाले गएजल के भीतर से खनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस निकाली गईआदि।

उसने विविध प्रकार के कृत्रिम विपैले रासायनिक कचरे को मिट्टी और पानी में डालकर उन्हें प्रदूषित और विद्युला बनाया तथा उसके द्वारा निर्मित कलकारखानोंफैक्ट्रियों, यातायात के साधनों (बसकार, ट्रक, वायुयानजलयान आदि) से निकलने वाले धुएं ने वायु को प्रदूषित किया।

यह प्रदूषण जब इतना अधिक बढ़ गया कि मनुष्य के स्वास्थ्य को खराब करने लगा तब मनुष्य चेता और उसका ध्यान पर्यावरण संरक्षण की ओर गया। वर्तमान संदर्भ में यदि देखा जाए तो पर्यावरण संरक्षण आज विश्व के सम्मुख विद्यमान सर्वाधिक ज्वलंत और जटिल समस्याओं में अग्रणी है।

वस्तुत: पर्यावरण के संरक्षण का प्रश्न तभी से उठने लगा था जब मनुष्य ने प्रकृति का दोहन उसकी वहन क्षमता से अधिक करना शुरू किया और इसकी शुरूआत औद्योगिक क्रांति के साथ ही हो गई थी। प्रकृति से करोड़ों वर्षों में निर्मित सौगातें मनुष्य ने कुछ ही वर्षों में निर्ममता से निकालकर उसकी छाती को छतविछत कर दिया है। वर्तमान में मनुष्य के समक्ष अस्तित्व का प्रश्न मुंह बाए खड़ा है।

पृथ्वी के कवच ओजोन गैस से लेकर पेड़पौधेपशुपक्षी आदि सभी मनुष्य की उपभोक्तावादी संस्कृति का शिकार हो रहे हैं। प्रकृति ईश्वर द्वारा मनुष्य को प्रदत्त एक अमूल्य उपहार और उसकी अनमोल धरोहर है। किंतुदुर्भाग्य से मनुष्य यह नहीं समझ पा रहा है कि प्रकृति की कीमत पर प्राप्त प्रत्येक वस्तु के लिए उसे अंत में पछताना पड़ेगा। मनुष्य द्वारा प्रकृति के विनाश के आंकड़ों को इसी तथ्य से समझा जा सकता है कि मनुष्य द्वारा 1950 तक लगभग आधे प्राकृतिक वन साफ किए जा चुके थे। विगत मात्र 1990-2000 के एक दशक में ही पृथ्वी से लगभग 940 लाख हेक्टेयर हरेभरे वृक्ष काटे गए।

इसके परिणामस्वरूप पेड़पौधों एवं जीवजंतुओं की कुल ज्ञात प्रजातियों में से 11000 प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर हैं और 800 प्रजातियां तो विलुप्त हो चुकी हैं। विकासशील देशों में प्रत्येक वर्ष 5060 लाख मनुष्य प्रदूषित जल अथवा प्रदूषित वायु के कारण हुई बीमारियों से कालकवलित हो जाते हैं।

एशियन ब्राउन हेजसमुद्रों में तेल के टैंकरों का रिसावउत्तरी ध्रुव में बर्फ की चट्टानों की मोटाई का कम होना, हिमालय के ग्लेशियरों का पीछे सरकनाउत्तरी अमेरिका में ठंड के दिनों में औसत तापमान में वृद्धि, आदि सभी संकेतक इस ओर पुरजोर इशारा कर रहे हैं कि सबकुछ ठीक और अनुकूल नहीं चल रहा है, कहीं कुछ गड़बड़ अवश्य है।

प्राकृतिक स्थलों का पर्यावरण पर्यटन की दृष्टि से अधिकाधिक दोहन किया जा रहा है। ऐसे स्थलों में प्राकृतिक रूप से निवास करने वाले पशुपक्षी एवं पेड़ पेड़पौधे ज्ञात-अज्ञात स्तर पर गम्भीर विस्थापन एक गम्भीर खामोशी के साथ मानो मानव मात्र को अंतिम चेतावनी देते प्रतीत होते हैं कि यदि अब भी नहीं चेते तो बहुत देर हो जाएगी। इस चेतावनी के पश्चात् भी यदि मनुष्य न चेता तो वैश्विक तापन (Global warmingके कारण ध्रुवों की बर्फ पिघलेगी और अधिकांश समुद्र तट पर बसे मुम्बई एवं लंदन जैसे शहर जलमग्न हो जाएंगे जीवजंतुओं और प्राकृतिक वनस्पति की अनेक प्रजातियां नष्ट हो जाएंगी, जलवायु में परिवर्तन होगा, ओजोन परत का क्षय होगा, इन सबका खामियाजा मनुष्य सहित सम्पूर्ण सजीव जगत को भरना होगा। सम्भव है कि एक दिन पृथ्वी पर से जीवन का लोप ही हो जाए और यदि जीवन विलुप्त नहीं भी होता तो वो इतना दयनीय | अवश्य हो जाएगा कि हमारी आने वाली पीढ़ियां हमसे ये प्रश्न करेंगीं कि आपने जानबूझकर अपने पांवों पर कुल्हाड़ी क्यों मारी और हमारी हरीभरी वसुंधरा की अनमोल धरोहर को नष्ट क्यों किया?

रेड डाटा बुक में दर्ज संरक्षित प्रजातियों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। जैवविविधता के संरक्षण हेतु बचे हुए सबूतों को खोजखोजकर प्रयोगशालाओं के शीतगृहों में संरक्षित किया जा रहा है। एक ओर जहां ये प्रयास किए जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर यह भी कटु सत्य है कि विश्व में आर्थिक विकास एवं समृद्धि के सर्वोच्च स्तर पर पहुंचने की अंधी दौड़ अभी भी जारी है। इसी के परिणामस्वरूप जारी है, प्राकृतिक वनों का विनाश और कंक्रीट के जंगलों का निर्माणदिनरात विपैला धुआं छोड़ने वाले उद्योगों का निर्माण आदि।

पर्यावरण संरक्षण की गतिविधियों को मनुष्य की दिनचर्या का अंग बनाने हेतु आवश्यक है कि इस संदर्भ में व्यापक जनजागरूकता कार्यक्रम बनाया और अंगीकार किया जाए। भारत सहित विश्व के समस्त पर्यावरणविदों द्वारा एकजुट होकर यह प्रयास करना चाहिए कि प्रदूषण के स्तर में संतुलन बना रहे। विभिन्न राष्ट्रीयअंतरराष्ट्रीय एवं गैरसरकारी स्वयंसेवी संस्थाओं (ग्रीन पीस, डब्ल्यूडब्ल्यू. एफ., आदिको इस संदर्भ में और अधिक ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि प्रकृति का संरक्षण ही मानव के दीर्घजीवी होने की गारण्टी है। अतः प्रकृति के संरक्षण को प्राथमिक लक्ष्य बनाकर किया गया विकास ही दीर्घावधि तक बना रह सकता है। यह सत्य है कि पर्यावरण संरक्षण आज एक उभरती हुई ज्वलंत समस्या है किंतु इसमें सम्भावनाएं भी अनंत हैं। मनुष्य प्रकृति के और अधिक निकट आ रहा है साथ ही समस्त वर्जनाएं और भ्रम भी टूट रहे हैं, जो कभी विज्ञान के समक्ष एक प्रश्नचिन्ह बने हुए थे।

आवश्यकता केवल इस बात की है कि मनुष्य जाने-अंजाने प्रकृति के लिए विनाशकारी सिद्ध हो चुकी गतिविधियों का ईमानदारीपूर्वक परित्याग करे और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कार्य करे।

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