रबीन्द्रनाथ टैगोर पर निबंध पर निबंध | Rabindranath Tagore Essay in Hindi | Rabindranath Tagore Nibandh

Rabindranath Tagore Essay in Hindi | Rabindranath Tagore Nibandh

कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर भारत के उन गिनेचुने व्यक्तियों में माने जाते हैं, जिनको साहित्यिक सेवाओं के कारण विश्व का सर्वाधिक चर्चित ‘नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। इन्हें लोग श्रद्धावश गुरुदेव’ कहते थे। रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई, 1861 को द्वारकानाथ टैगोर लेनकलकत्ता में देवेन्द्रनाथ ठाकुर के पुत्र के रूप में हुआ था। बालक रवीन्द्र को बचपन से ही एकाकी रहने की आदतसी पड़ गई थी, क्योंकि इनकी माता का निधन सन् 1875 में हो गया था, जब ये मात्र 14 वर्ष के थे। इनकी पहली कविता सन् 1874 में ‘तत्व भूमि’ पत्रिका में छपी थी । कविता का शीर्षक ‘अभिलाषा’ था।

बालक रवीन्द्र की अधिकांश शिक्षा यद्यपि घर पर ही हुई थी, फिर भी ये 1868 से लेकर 1874 तक, अर्थात् छह वर्ष स्कूल जाते रहे। रवीन्द्र की बाल्यकाल से साहित्य सृजन में रुचि थी, इसी वजह से ये कविता, कहानी नाटक, गद्य निबंधआदि लिखा करते थे। सन् 187677 के मध्य इनकी रचनाओं का एक बड़ा संस्करण छप चुका था। ये अलगअलग क्रमशः जनांकुरऔर ‘प्रतिबिम्ब’ में तथा इनके परिवार की निजी पत्रिका ‘भारती’ में प्रकाशित होते रहते थे।

रवीन्द्र बाबू को अभिनय का भी शौक था। वे सर्वप्रथम प्रहसन अभिनेता के रूप में सन् 1877 में सामने आए थे। कालान्तर में भी यदाकदा ये इस रूप में प्रकट होते रहे। संगीत शास्त्र, दर्शन शास्त्र रवीन्द्र के अन्य प्रिय विषय थे।

कभीकभी ये चित्र रचना करने भी बैठ जाते थे। इनकी बनाई कुछ तस्वीरें आज भी लाखों रुपये मूल्य की मानी जाती हैं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर अपने भाई सत्येन्द्रनाथ के साथ पहली बार इंग्लैंड सन् 1878 में गए थे। उस समय इनकी आयु मात्र 17 वर्ष की थी। वहां रहकर इन्होंने कुछ समय तक यूनीवर्सिटी कॉलेज लंदन में हेनरी मार्गो से अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन किया था। रवीन्द्र बाबू का लेखन कार्य अबाध गति से चलता रहा। सन् 1881 में इनके निबंधों का संग्रह ‘लेटर्स’ नाम से छपा था। इसी दौरान उन्होंने अपना संगीतमय नाटक वाल्मीकि-प्रतिभा भी लिखा और स्वयं वाल्मीकि का अभिनय किया था। इसी दौरान संगीत पर इन्होंने अपना पहला लिखित भाषण दिया था।

इंग्लैंड से भारत लौटने पर इन्हें पत्रिका निकालने की आवश्यकता अनुभव होने लगी। उन्होंने ‘साधनानामक एक पत्रिका निकालने का विचार किया। इस पत्रिका का सम्पादक उन्होंने अपने भतीजे सुधीन्द्रनाथ को बनाया था। यह एक ऐसी पत्रिका थी, जिसमें समसामयिक लेख और कविताएं छपती थीं। आपकी साहित्य-साधना की ओर सभी शिक्षित लोग सम्मान की दृष्टि से देख रहे थे।

आपकी रचनाओं का प्रचार बढ़ रहा था, इसलिए सुशिक्षित समाज द्वारा श्रद्धा प्रकट करने हेतु सन् 1907 में आपको बंगीय साहित्य सम्मेलन (Bengali Literary Conference) का सभापति चुना गया। रवीन्द्र बाबू की साहित्य-साधना को ध्यान में रखकर बंगीय साहित्य परिषद ने उनके जीवन की अर्द्धशती पूरी होने पर उनका अभिनन्दन किया। इसी दौरान रवीन्द्रनाथ ने अन्तप्रेरणा से अपनी कालजयी रचना ‘गीतांजलि’ का अविकल अंग्रेजी अनुवाद भी पूरा कर डाला था, ताकि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उस महती रचना का मूल्यांकन किया जा सके।

गीतांजलि के अंग्रेजी अनुवाद से अंग्रेजी साहित्य मण्डल में एक सनसनी-सी फैल गई। लोग इस सुन्दर रचना के शिल्प, अभिव्यक्ति भाव सभी पर मुग्ध थे। सन् 1913 में स्वीडिश अकादमी के द्वारा इसे नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया। बंगला के लब्ध-प्रतिष्ठ कवि अब विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर हो गए। रवीन्द्र बाबू की ख्याति साधारण झोपड़ी से लेकर ब्रिटिश सम्राट पंचम जार्ज तक फैल चुकी थी। सम्राट ने उन्हें ‘सर’ की उपाधि देकर सम्मानित किया। इसी वर्ष सी.एफ. एण्दूज तथा गांधीजी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर की भेंट शांति निकेतन में हुई। गांधीजी और रवीन्द्रनाथ की यह पहली मुलाकात थी।

शान्ति निकेतन में विश्वभारती’ (World University) की आधारशिला रखी गई, जिसमें गुरुकुल शैली में शिक्षा देने की व्यवस्था की गई थी। अपने विचारोंसिद्धान्तों का साहित्य सृजन के माध्यम से प्रचार करने के साथसाथ रवीन्द्रनाथ भाषण द्वारा भी लोगों को अपने सविचारों से प्रेरित करते थे कि भलाई की राह पर चलें। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सन् 1980 में उन्होंने ऐसे ही विषय ‘मानव का धर्म पर अपने विचार प्रकट किए थे, जिन्हें खूब सराहा गया। सुभाष चन्द्र बोस के अनुरोध पर उन्होंने कलकत्ता में महाजती सदन की आधारशिला रखी थी।

14 अप्रैल सन् 1941 को जब शान्ति निकेतन में इस महापुरुष की 80वीं वर्षगांठ धूमधाम से मनाई जा रही थी, तो कौन जानता था कि ये सदासदा के लिए भारतवासियों से बिछुड़ने की तैयारी कर रहे हैं। उन्हें गुर्दे की बीमारी थी। 7 अगस्त, 1941 को उनका आप्रेशन किया गयाजो सफल नहीं हुआ और वे समस्त हर्ष और विषादों को संजोए हुए चिर निद्रा में खो गए।

प्लिज नोट: आशा करते हैं आप को रबीन्द्रनाथ टैगोर पर निबंध ( Rabindranath Tagore Essay in Hindi) अच्छा लगा होगा।

अगर आपके पास भी Rabindranath Tagore Nibandh पे इसी प्रकार का कोई अच्छा सा निबंध है तो कमेंट बॉक्स मैं जरूर डाले। हम हमारी वेबसाइट के जरिये आपने दिए हुए निबंध को और लोगों तक पोहचने की कोशिश करेंगे।

साथ ही आपको अगर आपको यह रबीन्द्रनाथ टैगोर पर हिन्दी निबंध पसंद आया हो तो Whatsapp और facebook के जरिये अपने दोस्तों के साथ शेअर जरूर करे।

Leave a Comment