टेलीविजन पर निबंध | Television Essay in Hindi | Television Nibandh

 Television Essay in Hindi | Television Nibandh

कुछ समय पहले तक जब हम किसी जादूगर की कहानी में पढ़ते थे कि जादूगर ने जैसे ही अपने ग्लोब पर हाथ घुमाया, वैसे ही उसका शत्रु ग्लोब पर दिखाई देने लगा। जादूगर ने उसकी सारी क्रियाओं को अपने कमरे में बैठकर ही देख लिया तो हमें महान् आश्चर्य होता था। आज इस प्रकार का जादू हम हर रोज अपने घर करते हैं। स्विच ऑन करते ही बोलती हुई रंगबिरंगी तस्वीरें हमारे सामने आ जाती हैं। यह सब टेलीविजन का चमत्कार है, जिसके माध्यम से हम हजारोंलाखों मील दूर की क्रियाओं को दूरदर्शन-यंत्र पर देख सकते हैं।

दूरदर्शन का आविष्कार- 25 जनवरी सन् 1926 को इंग्लैंड में एक इंजीनियर जॉन बेयर्ड ने रायल इंस्टीट्यूट के सदस्यों के सामने टेलीविजन का सर्वप्रथम प्रदर्शन किया था। उसने कठपुतली के चेहरे का चित्र रेडियो तरंगों की सहायता से बगल वाले कमरे में बैठे हुए वैज्ञानिकों के सामने निर्मित किया था। विज्ञान के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। मानव-इतिहास में आज के दिन पहली बार दूरदर्शन संभव हो सका था। सैकड़ों-हजारों वर्ष के स्वन को जान बेयर्ड ने सत्य कर दिखाया।

दूरदर्शन यंत्र की तकनीक- दूरदर्शन यंत्र बहुत कुछ उसी सिद्धांत पर काम करता है, जिस पर रेडियो। अंतर केवल इतना है कि रेडियो यंत्र तो किसी ध्वनि को विद्युत् तरंगों में बदलकर उन्हें दूर-दूर तक प्रसारित कर देता है और इस प्रकार प्रसारित की जा रही विद्युत्-तरंगों को फिर ध्वनि में बदल देता है, परंतु दूरदर्शन यंत्र प्रकाश को विद्युत्-तरंगों में बदलकर प्रसारित करता है। रेडियो द्वारा हम प्रसारित की जा रही ध्वनि को सुन सकते हैं और दूरदर्शन द्वारा हम प्रसारित किए जा रहे दृश्य को देख सकते हैं।

दूरदर्शन के प्रसारण यंत्र के लिए एक विशेष प्रकार का कैमरा होता है। इस कमर क सामने का दृश्य जिस परदे पर प्रतिबिंबित होता है, उसे ‘मोजेक’ कहते हैं। इस मोजेक में 405 क्षैतिज (पड़ी) रेखाएँ होती हैं। इस मोजेक पर एक ऐसे रासायनिक पदार्थ का लेप रहता है, जो प्रकाश के लिए अत्यधिक संवेदनशील होता है। इलैक्ट्रॉनों द्वारा प्रकाश की किरणें मोजेक पर इस ढंग से फेंकी जाती हैं कि वे मोजेक की 405 लाइनों पर बारीबारी से एक सकेंड में 25 बार गुजर जाती हैं। मोजेक पर लगा लेप इस पर पड़ने वाले प्रकाश से प्रभावित होता है।

किसी वस्तु या दृश्य के उज्ज्वल अंशों से आनेवाला प्रकाश तेज और काले अंशों से आनेवाला प्रकाश मंद होता है। यह प्रकाश एक कैथोड किरण ट्यूब पर पड़ता है। इस ट्यूब में प्रकाश की तेजी या मंदता के अनुसार बिजली की तेजी या मंदता के अनुसार बिजली की तेज तरंगें उत्पन्न होती हैं। इन तरंगों को रेडियो की तरंगों की भाँति प्रसारित किया जाता है और ग्रहणयंत्र द्वारा फिर प्रकाश में बदल लिया जाता है।

एक विचित्र तथ्य यह है कि सीधी रेखा में चलती हुई दूरदर्शन की विद्युत् तरंगें लाखोंकरोड़ों मील दूर तक मजे से पहुँच जाती हैं, परंतु पृथ्वी की गोलाई के कारण वे पृथ्वी के एक भाग से दूसरे भाग तक एक निश्चित दूरी तक ही पहुंच पाती हैं। दूरदर्शन का प्रसारणस्तंभ जितना ऊंचा होगा, उतनी ही दूर तक उसका प्रसारित-चित्र दूरदर्शन ग्रहण-यत्र पर दिखाई पड़ सकेगा। इस बाधा के कारण पहले अमरीका से प्रसारित दूरदर्शन कार्यक्रम यूरोप या अन्य महाद्वीपों में नहीं देखे जा सकते थे, परंतु अब कृत्रिम उपग्रहों पर प्रतिक्षिप्त करके इन्हें कहीं भी देखा जा सकता है। उपग्रहों की सहायता से अब सारी पृथ्वी के मौसम के चित्र दूरदर्शन पर देखे जा सकते हैं।

दूरदर्शन के लाभ- दूरदर्शन का प्रयोग केवल मनोरंजन के लिए ही नहीं, अपितु वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए भी किया गया है। चंद्रमा पर भेजे गए अंतरिक्ष यानों में दूरदर्शन यंत्र लगाए गए थे और उन्होंने वहाँ से चंद्रमा के बहुत सुंदर चित्र पृथ्वी पर भेजेजो अमरीकी अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा पर गए थे, उनके पास भी दूरदर्शन कैमरे थे और उन्होंने पृथ्वी पर स्थित लोगों को भी चंद्रमा के तल का ऐसा दर्शन करा दिया, मानो वे (दर्शक) भी चंद्रमा पर ही घूमफिर रहे हों। मंगल तथा शुक्र ग्रहों की ओर भेजे गए अंतरिक्ष-यानों में लगे दूरदर्शन-यंत्रों ने उन ग्रहों के अब तक प्राप्त सबसे अच्छे तथा विश्वसनीय चित्र पृथ्वी पर भेजे हैं।

चिकित्सा व शिक्षा के क्षेत्र में दूरदर्शन का प्रयोग-अन्य क्षेत्रों में भी टेलीविजन की उपयोगिता को वैज्ञानिकों ने पहचाना है। उदाहरण के लिए अनुभवी सर्जन यदि हृदय का आपरेशन करता है, तो उस कमरे में अधिक-से-अधिक पाँच या छह विद्यार्थी ही आपरेशन की क्रिया को देखकर ऑपरेशन का सही तरीका सीख सकते हैं, किंतु टेलीविजन की सहायता से बड़े हाल में परदे पर आपरेशन की संपूर्ण क्रिया तीन-चार सौ विद्यार्थियों को सुगमता से दिखाई जा सकती है।

अमेरिका के कुछ बड़े अस्पतालों के आपरेशनथियेटर में स्थायी रूप से टेलीविजन के यंत्र लगा दिए गए हैं, ताकि महत्वपूर्ण आपरेशन की क्रियाएँ टेलीविजन द्वारा परदे पर विद्यार्थियों को दिखाई जा सकी उद्योग और व्यवसाय के क्षेत्र में दूरदर्शन के प्रयोग-उद्योग और व्यवसाय के क्षेत्र में टेलीविजन महत्त्वपूर्ण योग दे सकता है। कुछ ही दिन हुए अमेरिका की एक औद्योगिक प्रदर्शनी में दिखलाया गया था कि किस प्रकार टेलीविजन की सहायता से दूर से ही इंजीनियर भारी बोझ उठानेवाली क्रेन का परिचालन कर सकता है, यद्यपि क्रेन इंजीनियर की दृष्टि से परे रहता है। मात्र क्रेन का चित्र टेलीविजन के परदे पर हर क्षण रहता है, अत: दूर बैठा हुआ इंजीनियर कलपुर्जों की सहायता से क्रेन का समुचित रूप से परिचालन करने में समर्थ होता है।

भारत में दूरदर्शन भारत में दूरदर्शन का सबसे पहला केंद्र नई दिल्ली में 15 सितंबर 1959 में चालू हुआ था। पहले उसका उपयोग केवल उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षा के लिए किया जाता था। मई 1965 से आधे घंटे का नियमित मनोरंजन कार्यक्रम शुरू हुआ। सन् 1971 ई. में बंबई, सन् 1973 में श्रीनगर और अमृतसर में भी दूरदर्शन प्रसारण-केंद्र स्थापित कर दिए गए।

अब तो पूरे देश में दूरदर्शन का जाल-सा बिछ गया है। इस प्रकार टेलीविजन हमारे मनोरंजन का सशक्त माध्यम है। भीड़-भरे स्थलों पर, विशिष्ट समाराहों में, क्रीड़ा प्रतियोगिताओं में जहाँ हम आसानी से नहीं पहुँच सकतेटेलीविजन के माध्यम से हम वहाँ पर उपस्थित रहने जैसा सुख प्राप्त करते हैं।

कुछ समय पहले तक जब हम किसी जादूगर की कहानी में पढ़ते थे कि जादूगर ने जैसे ही अपने ग्लोब पर हाथ घुमाया, वैसे ही उसका शत्रु ग्लोब पर दिखाई देने लगा। जादूगर ने उसकी सारी क्रियाओं को अपने कमरे में बैठकर ही देख लिया तो हमें महान् आश्चर्य होता था। आज इस प्रकार का जादू हम हर रोज अपने घर करते हैं। स्विच ऑन करते ही बोलती हुई रंगबिरंगी तस्वीरें हमारे सामने आ जाती हैं। यह सब टेलीविजन का चमत्कार है, जिसके माध्यम से हम हजारोंलाखों मील दूर की क्रियाओं को दूरदर्शन-यंत्र पर देख सकते हैं।

दूरदर्शन का आविष्कार- 25 जनवरी सन् 1926 को इंग्लैंड में एक इंजीनियर जॉन बेयर्ड ने रायल इंस्टीट्यूट के सदस्यों के सामने टेलीविजन का सर्वप्रथम प्रदर्शन किया था। उसने कठपुतली के चेहरे का चित्र रेडियो तरंगों की सहायता से बगल वाले कमरे में बैठे हुए वैज्ञानिकों के सामने निर्मित किया था। विज्ञान के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। मानव-इतिहास में आज के दिन पहली बार दूरदर्शन संभव हो सका था। सैकड़ों-हजारों वर्ष के स्वन को जान बेयर्ड ने सत्य कर दिखाया।

दूरदर्शन यंत्र की तकनीक- दूरदर्शन यंत्र बहुत कुछ उसी सिद्धांत पर काम करता है, जिस पर रेडियो। अंतर केवल इतना है कि रेडियो यंत्र तो किसी ध्वनि को विद्युत् तरंगों में बदलकर उन्हें दूर-दूर तक प्रसारित कर देता है और इस प्रकार प्रसारित की जा रही विद्युत्-तरंगों को फिर ध्वनि में बदल देता है, परंतु दूरदर्शन यंत्र प्रकाश को विद्युत्-तरंगों में बदलकर प्रसारित करता है। रेडियो द्वारा हम प्रसारित की जा रही ध्वनि को सुन सकते हैं और दूरदर्शन द्वारा हम प्रसारित किए जा रहे दृश्य को देख सकते हैं।

दूरदर्शन के प्रसारण यंत्र के लिए एक विशेष प्रकार का कैमरा होता है। इस कमर क सामने का दृश्य जिस परदे पर प्रतिबिंबित होता है, उसे ‘मोजेक’ कहते हैं। इस मोजेक में 405 क्षैतिज (पड़ी) रेखाएँ होती हैं। इस मोजेक पर एक ऐसे रासायनिक पदार्थ का लेप रहता है, जो प्रकाश के लिए अत्यधिक संवेदनशील होता है। इलैक्ट्रॉनों द्वारा प्रकाश की किरणें मोजेक पर इस ढंग से फेंकी जाती हैं कि वे मोजेक की 405 लाइनों पर बारीबारी से एक सकेंड में 25 बार गुजर जाती हैं। मोजेक पर लगा लेप इस पर पड़ने वाले प्रकाश से प्रभावित होता है।

किसी वस्तु या दृश्य के उज्ज्वल अंशों से आनेवाला प्रकाश तेज और काले अंशों से आनेवाला प्रकाश मंद होता है। यह प्रकाश एक कैथोड किरण ट्यूब पर पड़ता है। इस ट्यूब में प्रकाश की तेजी या मंदता के अनुसार बिजली की तेजी या मंदता के अनुसार बिजली की तेज तरंगें उत्पन्न होती हैं। इन तरंगों को रेडियो की तरंगों की भाँति प्रसारित किया जाता है और ग्रहणयंत्र द्वारा फिर प्रकाश में बदल लिया जाता है।

एक विचित्र तथ्य यह है कि सीधी रेखा में चलती हुई दूरदर्शन की विद्युत् तरंगें लाखोंकरोड़ों मील दूर तक मजे से पहुँच जाती हैं, परंतु पृथ्वी की गोलाई के कारण वे पृथ्वी के एक भाग से दूसरे भाग तक एक निश्चित दूरी तक ही पहुंच पाती हैं। दूरदर्शन का प्रसारणस्तंभ जितना ऊंचा होगा, उतनी ही दूर तक उसका प्रसारित-चित्र दूरदर्शन ग्रहण-यत्र पर दिखाई पड़ सकेगा। इस बाधा के कारण पहले अमरीका से प्रसारित दूरदर्शन कार्यक्रम यूरोप या अन्य महाद्वीपों में नहीं देखे जा सकते थे, परंतु अब कृत्रिम उपग्रहों पर प्रतिक्षिप्त करके इन्हें कहीं भी देखा जा सकता है। उपग्रहों की सहायता से अब सारी पृथ्वी के मौसम के चित्र दूरदर्शन पर देखे जा सकते हैं।

दूरदर्शन के लाभ- दूरदर्शन का प्रयोग केवल मनोरंजन के लिए ही नहीं, अपितु वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए भी किया गया है। चंद्रमा पर भेजे गए अंतरिक्ष यानों में दूरदर्शन यंत्र लगाए गए थे और उन्होंने वहाँ से चंद्रमा के बहुत सुंदर चित्र पृथ्वी पर भेजेजो अमरीकी अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा पर गए थे, उनके पास भी दूरदर्शन कैमरे थे और उन्होंने पृथ्वी पर स्थित लोगों को भी चंद्रमा के तल का ऐसा दर्शन करा दिया, मानो वे (दर्शक) भी चंद्रमा पर ही घूमफिर रहे हों। मंगल तथा शुक्र ग्रहों की ओर भेजे गए अंतरिक्ष-यानों में लगे दूरदर्शन-यंत्रों ने उन ग्रहों के अब तक प्राप्त सबसे अच्छे तथा विश्वसनीय चित्र पृथ्वी पर भेजे हैं।

चिकित्सा व शिक्षा के क्षेत्र में दूरदर्शन का प्रयोग-अन्य क्षेत्रों में भी टेलीविजन की उपयोगिता को वैज्ञानिकों ने पहचाना है। उदाहरण के लिए अनुभवी सर्जन यदि हृदय का आपरेशन करता है, तो उस कमरे में अधिक-से-अधिक पाँच या छह विद्यार्थी ही आपरेशन की क्रिया को देखकर ऑपरेशन का सही तरीका सीख सकते हैं, किंतु टेलीविजन की सहायता से बड़े हाल में परदे पर आपरेशन की संपूर्ण क्रिया तीन-चार सौ विद्यार्थियों को सुगमता से दिखाई जा सकती है।

अमेरिका के कुछ बड़े अस्पतालों के आपरेशनथियेटर में स्थायी रूप से टेलीविजन के यंत्र लगा दिए गए हैं, ताकि महत्वपूर्ण आपरेशन की क्रियाएँ टेलीविजन द्वारा परदे पर विद्यार्थियों को दिखाई जा सकी उद्योग और व्यवसाय के क्षेत्र में दूरदर्शन के प्रयोग-उद्योग और व्यवसाय के क्षेत्र में टेलीविजन महत्त्वपूर्ण योग दे सकता है। कुछ ही दिन हुए अमेरिका की एक औद्योगिक प्रदर्शनी में दिखलाया गया था कि किस प्रकार टेलीविजन की सहायता से दूर से ही इंजीनियर भारी बोझ उठानेवाली क्रेन का परिचालन कर सकता है, यद्यपि क्रेन इंजीनियर की दृष्टि से परे रहता है। मात्र क्रेन का चित्र टेलीविजन के परदे पर हर क्षण रहता है, अत: दूर बैठा हुआ इंजीनियर कलपुर्जों की सहायता से क्रेन का समुचित रूप से परिचालन करने में समर्थ होता है।

भारत में दूरदर्शन भारत में दूरदर्शन का सबसे पहला केंद्र नई दिल्ली में 15 सितंबर 1959 में चालू हुआ था। पहले उसका उपयोग केवल उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षा के लिए किया जाता था। मई 1965 से आधे घंटे का नियमित मनोरंजन कार्यक्रम शुरू हुआ। सन् 1971 ई. में बंबई, सन् 1973 में श्रीनगर और अमृतसर में भी दूरदर्शन प्रसारण-केंद्र स्थापित कर दिए गए।

अब तो पूरे देश में दूरदर्शन का जाल-सा बिछ गया है। इस प्रकार टेलीविजन हमारे मनोरंजन का सशक्त माध्यम है। भीड़-भरे स्थलों पर, विशिष्ट समाराहों में, क्रीड़ा प्रतियोगिताओं में जहाँ हम आसानी से नहीं पहुँच सकतेटेलीविजन के माध्यम से हम वहाँ पर उपस्थित रहने जैसा सुख प्राप्त करते हैं।

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